Sunday, February 8, 2026

निष्काम कर्म और मोक्ष

 आत्मा अमर है। उसका न जन्म होता है और न मृत्यु। शरीर नष्ट होता है, पर आत्मा शाश्वत रहती है। जब आत्मा पूर्ण रूप से शुद्ध होकर शरीर का त्याग करती है, तब वह परमात्मा में लीन होकर उनसे एकाकार हो जाती है। वही अवस्था मोक्ष कहलाती है।

परंतु जब आत्मा अपने साथ शुभ या अशुभ कर्मों के संस्कार लेकर शरीर का त्याग करती है, तब वह सूक्ष्म शरीर धारण कर लेती है। यही सूक्ष्म शरीर उसे पुनः किसी न किसी योनि अथवा लोक में ले जाता है। वहाँ आत्मा को अपने ही कर्मों के अनुसार सुख और दुःख का अनुभव करना पड़ता है। इस प्रकार कर्म ही जन्म-मरण के बंधन का मूल कारण बनते हैं।

इसलिए मनुष्य जीवन का परम उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह अपने पूर्व कर्मों के फलों को धैर्यपूर्वक स्वीकार करे और अपने वर्तमान कर्मों को निष्काम भाव से संपन्न करे। मनुष्य को चाहिए कि वह हर कर्म को केवल कर्तव्य समझकर करे, न कि फल की लालसा से।

वास्तव में हमारे कर्म ही हमारे सूक्ष्म शरीर का निर्माण करते हैं। जब कर्म फल की इच्छा से किए जाते हैं, तब वे सूक्ष्म शरीर में संस्कार बनकर संचित होते जाते हैं और आत्मा को बंधन में डालते हैं। परंतु जब वही कर्म कर्तव्य-बोध, सेवा-भाव और समर्पण के साथ किए जाते हैं, तब वे आत्मा को बंधन में नहीं डालते, बल्कि उसे शुद्ध करते हैं।

अतः साधक के लिए आवश्यक है कि वह बुरे कर्मों का पूर्ण त्याग करे और अच्छे कर्मों को भी इस भावना से करे कि — “मैं कर्ता नहीं हूँ, यह कार्य मुझसे परमात्मा द्वारा कराया जा रहा है।” यही निष्काम कर्म योग का सार है।

इसी महान सत्य को श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में कहा है —

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। फल को परमात्मा पर छोड़ देना ही वास्तविक मुक्ति का मार्ग है।

-Life With Rahul

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Friday, May 2, 2025

बहुत अधिक न जानें

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एक सुकून भरा जीवन जीने के लिए आवश्यक है कि बहुत ज्यादा आंकलन न करें, बहुत ज्यादा न जाने ।
किसी फिल्म की कहानी तभी तक अच्छी लगती है जब तक हम उसकी कहानी को Predict नहीं कर लेते ।
बचपन भी शायद इसीलिए उत्साहवर्धक होता है क्योंकि तब हम कम जानते थे ।
दोस्त, रिश्तेदार तभी तक अच्छे लगते हैं जब तक हम उन्हें कम जानते हैं ।
एक समय के बाद हम खुद को इतनी अधिक सुरक्षा के घेरे में डाल लेते हैं कि फिर बस खुद को सुरक्षित ही करते रह जाते हैं, जीवन का आनंद नहीं ले पाते ।
ये बात भी बहुत बाद में समझ आती है कि आप कितना भी हाथ पैर पटक लें, कितना भी कुछ कर लें, जीवन में बहुत कुछ पहले से तय है । इसलिए ये जरूरी है कि जितना हो सके जीवन का आनंद लें ।
आप खुद को कितना भी सुरक्षित कर लें, परन्तु यदि आपके पूर्व कर्म ठीक नहीं थे तो आपका कर्मफल आपको ठीक वैसे है ढूंढ लेगा, जैसे हजारों गायों के समूह में बछड़ा अपनी मां को ढूंढ लेता है । इसलिए कुछ करना ही है तो अच्छे कर्म करें, अगर ये भी न कर सकें तो खुद को बुरे कर्मों में लिप्त होने से, और अपने मन को ईर्ष्या, द्वेष जैसी भावनाओं से बचाएं ।
Life With Rahul 

Monday, August 22, 2022

हमारी संस्कृति हमारी विरासत (भाग-1)

ब्रिटिश लेखक, V.S. Naipaul ने अपनी पुस्तक "India: A Wounded Civilization" में लिखा है कि, भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जो दुनिया की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यता होने के बावजूद भी यहां के लोगविदेशियों के द्वारा लिखे गए इतिहास को सच मानते हैं, और किसी तथ्य की जांच के लिए विदेशियों द्वारा लिखे इतिहास को ही प्रमाणिक मानते हैं ।
और उनमें भी उन लोगों के लिखे इतिहास को प्रमाणिक मानते हैं जिन्होंने हम पर आक्रमण किया था, हम पर हुकूमत की, हमको गुलामी की जंजीरों में जकड़ा ।
गुप्तकाल तक भारत में स्त्रियों की दशा और जातिगत व्यवस्था बहुत उच्च कोटि पर थी, ब्रह्मणवाद जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी,
पूरे विश्व में सर्वाधिक स्त्री शासक भारत में रही, वो भी उच्च कोटि की शासिका । 
पठन-पाठन का कार्य भी पूरे विश्व में सर्वाधिक भारतीय स्त्रियों द्वारा ही किया गया ।
यही दशा सभी जातियों के लिए भी समान रूप से लागू थी, सभी जातियों के लोग महान राजा के पद तक पहुंचते थे । 
और तो और रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथ को लिखने वाले महर्षि वेदव्यास और महर्षि वाल्मिकी भी अनुसूचित जाति वर्ग से थे,
ये नस्लभेद, रंगभेद, दासप्रथा, स्त्रियों को घर में बंद कर के रखने वाली प्रथा सब बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा भारत में प्रसारित की गई ।
दरअसल 1000 साल की गुलामी में भारत के लोगों की मानसिकता में बल और छल के माध्यम से इतना बदलाव कर दिया गया कि हमको हमारा वास्तविक इतिहास अब बस कहानी कल्पना लगता है ।
आखिर लगेगा भी क्यों नहीं, भारतीयों द्वारा लिखे इतिहास को कभी पढ़ाया भी तो नहीं गया ।

Thursday, April 7, 2022

समय बलवान


मनुष्य बलवान नहीं होता है, उसका समय सबसे बलवान होता है।



जब समय ख़राब होता है तो रस्सी भी साँप बनकर डस लेती है और अपना परम मित्र भी घोर शत्रु बन जाता है !

जो मार्ग अत्यंत प्रकाशवान होता है, वह अत्यंत ही भयावह और दुरूह हो जाता है ! अरे यह बड़ों बड़ों की मति भ्रष्ट कर देता है ! विद्वान् भी मूर्खों वाली बातें करने लगता है !

और जब समय सही होता है, सब कुछ उलट जाता है ! लोग जबरदस्ती आ आकर आपकी सहायता करने लगते हैं ! मार्ग अपने आप स्वयं दिखाई देने लगता है ! जो शेर आपको खाने के लिए आ रहा होता है, वह आपकी रक्षा करने लग जाता है !

मतलब कहने का अभिप्राय यह है कि समय से बढ़कर कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं !

लोग अक्सर पहले खूब तैश में आकर जवानी के जोश में ऐसा ही बोला करते हैं कि नहीं मनुष्य जो चाहे वो कर सकता है ! पर समय मार-मार कर समझा ही देता है कि हाँ उसके सामने भगवान के अवतारों की भी नहीं चलती !

जब समय ठीक आएगा तो स्वयं आप अच्छे डिसिजन भी लेने लगेंगे ! और वह निर्णय साधारण होगा लेकिन उस निर्णय से सब कुछ बदल जाएगा !

और यह समय अथवा भाग्य या प्रारब्ध अपने पूर्वजन्मों के कर्मों से ही बनते हैं।

इसीलिए कहा गया है शुभ कर्म करते रहो और फल की इच्छा मत करो, क्योंकि फल देने का अधिकार उसका है और अपने किये गए कर्मों के फल को प्राप्त करने का पूरा अधिकार मनुष्य का है। इसमें भगवान् की भी नहीं चलती, सब नियम के अनुकूल हैं।

बस यह है कि प्रार्थना करने से शुभ कर्म का प्रारब्ध या भाग्य या फल पहले मिल जाता है या भगवान् कृपा करके किसी शुभ कर्म का फल पहले दिलवा देते हैं, परंतु कोई यह ना सोचे कि हमारे बुरे कर्म का फल हमें नहीं मिलेगा, वह गाहे बगाहे हमें ही भोगना पड़ेगा, कोई भगवान्, कोई संत, कोई महापुरुष उस फल को हमें भोगने से रोक नहीं सकते।

कर्मसमायुक्तं दैवं साधू विवर्धते। 👇
पुरुषार्थ का सहारा पाकर ही भाग्य भली भाँति बढ़ता है।

शुक्रनीति कहती है :

अनुकूले ज्यादा दैवे क्रियाकल्पा सुफला भवेत्।👇
अर्थात - जब भाग्य अनुकूल रहता है, तब थोड़ा भी पुरुषार्थ सफल हो जाता है।

फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार से इंटरव्यू के दौरान पूछा जाता है कि आप के सफलता का श्रेय किसे देते हैं ??

उसका कहना था कि 30% मैं अपनी मेहनत को और 70% मैं अपने भाग्य को।

प्रश्न पूछने वाले ने कहा आप इतने बड़े चैनल पर ऐसी बात कर रहे हैं, देख लीजिए।

उसने कहा बिलकुल मैं इसको आधिकारिक तौर पर कहता हूँ, क्योंकि घर से स्टूडियो तक पहुँचते हुए मुझे ऐसे ऐसे लोग मिलते हैं जो मुझसे ज्यादा टेलेंटेड, मुझसे ज्यादा हैंडसम, मुझसे ज्यादा मेहनती, वह बिचारे सालों साल से चक्कर लगा रहे हैं पर उनको ब्रेक नहीं मिलता लेकिन मुझको मिला और जनता मुझे हाथों हाथ ले रही है।

"लाख तक़दीर एक तरफ़, एक तक़दीर एक तरफ़।
लाख तदबीर एक तरफ़, एक तकदीर एक तरफ़।।"

पढ़े फ़ारसी बेचे तेल, यह देखो कर्ता का खेल।

नियतिः कारणं लोके नियतिः कर्मसाधनं।
नियतिः सर्वभूतानां नियोगेष्विह कारणं।।

जगत में नियति ही सब का कारण है। नियति ही समस्त कर्मों का साधन है। नियति ही समस्त प्राणियों को विभिन्न कर्मों में नियुक्त करने का कारण है।

नास्ति खलु दुष्करं दैवस्य।
भाग्य के लिए कुछ भी दुष्कर नहीं।

न हि शक्यम दैवमन्य थाकर्तुमभि युक्तेनापि।
उद्योगी व्यक्ति द्वारा भी भाग्य को नहीं बदला जा सकता।

दैवमेव हि नृणाम वृधौ क्षये कारणम।
मनुष्यों की अपनी वृद्धि और क्षय का कारण भाग्य ही है।

गुणा न यूयं नियतिर्गरियसी।
हे सद्गुणों। तुम नहीं, नियति प्रबल है।

पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान।
भीलन लूटीं गोपिका, वही अर्जुन वही बान।।

👉 अगर आप का समय विपरीत चल रहा है तो कॉग्निटिव फ्यूजन मत करना क्योंकि बढ़ते बीपी और लक्षणों को सुनकर हमसे पहले कार्डियो वाले ही आपको SSRI दे देंगे। सूरदास जी ने बहुत पहले एक भजन लिखा था होत न सब दिन एक समान...

एक दिन राजा हरिश्चन्द्र घर, सम्पति मेरू समान।
एक दिन जाय स्वपच घर बिक गयो अंबर हरत मसान।👇
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के इतने ठाट-बाट थे की कुबेर भी शरमा जाए। हरिश्चन्द्र सत्य की रक्षा के लिए बिक गये थे और अंत उन्हें श्मशान में जाकर नौकरी करनी पड़ी।

कबहुँक राम जानकी के संग, विचरत पुष्प विमान।
कबहुँक रुदन करत हम देखे माधो सघन-उद्यान।👇
भगवान राम और सीता जी की चर्चा किये हैं कि अच्छे समय में वो पुष्पक विमान से यहाँ-वहां विचरण करते थे और ख़राब समय आया तो एक दूसरे के वियोग में सीताजी अशोक वाटिका में रो रहीं थीं और रामचंद्र जी जंगलों में उन्हें ढूंढ़ते हुए रो रहे थे।

Wednesday, March 23, 2022

Overthinking की समस्या एवं समाधान

ओवर थिंकिंग :-
बहुत ज्यादा या लगातार सोचते रहने,
अक्सर नकारात्मक विचारों में डूबे रहना,
जिंदगी से बार-बार शिकायत करना,
अपने अंदर के उत्साह और उमंग को मरता हुआ महसूस करना,

लक्षण:-
- खुद से बार-बार सवाल पूछना जैसे, ये होगा तो क्या होगा?
- ऐसी बातों के बारे में सोचना जिन पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है। 
- लोगों से कही गई पुरानी बातों के बारे में सोचना।
- ये सोचना कि, काश ये न किया होता या काश ये न कहा होता।
- अपनी गलतियों के बारे में लगातार सोचते रहना। 
- किसी की कही गई बात को दिमाग में लगातार लेकर घूमते रहना। 
- आसपास की बातों से बेखबर होकर उधेड़-बुन में लगे रहना। 
- दिमाग में बार-बार शर्मिंदा करने वाले पलों का याद आना।
- सोने में परेशानी होना क्योंकि लगता है कि दिमाग बंद नहीं होगा।
- बीती बातों या घटनाओं में छिपे अर्थ को तलाशने में ढेर सारा समय खर्च करना।
- बीते कल या आने वाले कल की चिंता को लेकर बहुत ज्यादा सोचना।
- अपनी परेशानियों और चिंताओं को मन से निकाल नहीं पाना। 

समाधान:- 

1) अपने वर्तमान के कार्य पर focus कीजिए, उसे 

2) वर्तमान में रहिये, बस वर्तमान को बेहतर बनाने पर Focus कीजिए । वर्तमान के कार्य को पूर्ण करने पर ध्यान लगाइए, भविष्य के परिणाम की उधेड़बुन में न फंसे ।
वैसे भी भूत को आप बदल नहीं सकते और भविष्य को आप नियंत्रित नहीं कर सकते, आप सिर्फ अपने वर्तमान को प्रबंधित कर सकते हैं अपनी आदतों को नियंत्रित कर सकते हैं और यही प्रबन्धन और नियंत्रण एक सुखी और बेहतर भविष्य का निर्माण करेगा । 
 "भूतकाल में मत उलझो, भविष्य के सपने मत देखो वर्तमान पर ध्यान दो, यही ख़ुशी का रास्ता है।"

3) विचारों का काम है दिमाग में तैरना। अगर आप सोचें के आप अपने विचारों को कंट्रोल कर लेंगे, तो आप गलत सोच रहे हैं। दिमाग में तो हर समय तरह-तरह के विचार आते ही रहेंगे, क्यूंकि दिमाग का काम यही है। लेकिन आपका काम हर समय उन विचारों पर तवज्जो देना नहीं है। दिमाग अपना काम कर रहा है, आप अपना काम करिये। नार्मल रहिये, थोड़े समय में विचार और फ़ीलिंग्स स्वयं ही बदल जाएंगे। 

4) अगर आपको अक्सर नकारात्मक विचार ही ज्यादा आते हैं, तो उनको बदलने का भी उपाय है। आप सिर्फ़ पॉजिटिव बातें ही सोचिए और बोलिये। आपका दिमाग शुरू-शुरू में आपका विरोध करेगा, लेकिन धीरे-धीरे उसको भी पाजिटिविटी की आदत पड़ जाएगी।

5) अच्छा एक कहानी से शायद आप मेरी बात को बेहतर समझ पाएं - 

किसी जंगल मे एक गर्भवती हिरणी थी जिसका प्रसव होने को ही था . उसने एक तेज धार वाली नदी के किनारे घनी झाड़ियों और घास के पास एक जगह देखी जो उसे प्रसव हेतु सुरक्षित स्थान लगा. अचानक उसे प्रसव पीड़ा शुरू होने लगी, लगभग उसी समय आसमान मे काले काले बादल छा गए और घनघोर बिजली कड़कने लगी जिससे जंगल मे आग भड़क उठी .
वो घबरा गयी उसने अपनी दायीं और देखा लेकिन ये क्या वहां एक बहेलिया उसकी और तीर का निशाना लगाये हुए था, उसकी बाईं और भी एक शेर उस पर घात लगाये हुए उसकी और बढ़ रहा था अब वो हिरणी क्या करे ?,
वो तो प्रसव पीड़ा से गुजर रही है ,
अब क्या होगा?, 

क्या वो सुरक्षित रह सकेगी?,
क्या वो अपने बच्चे को जन्म दे सकेगी ?,
क्या वो नवजात सुरक्षित रहेगा?,
या सब कुछ जंगल की आग मे जल जायेगा?, 

अगर इनसे बच भी गयी तो क्या वो बहेलिये के तीर से बच पायेगी ?
या क्या वो उस खूंखार शेर के पंजों की मार से दर्दनाक मौत मारी जाएगी?
जो उसकी और बढ़ रहा है, 

उसके एक और जंगल की आग, दूसरी और तेज धार वाली बहती नदी, और सामने उत्पन्न सभी संकट, अब वो क्या करे? 

लेकिन फिर उसने अपना ध्यान अपने नव आगंतुक को जन्म देने की और केन्द्रित कर दिया .
फिर जो हुआ वो आश्चर्य जनक था . 

कडकडाती बिजली की चमक से शिकारी की आँखों के सामने अँधेरा छा गया, और उसके हाथो से तीर चल गया और सीधे भूखे शेर को जा लगा . बादलो से तेज वर्षा होने लगी और जंगल की आग धीरे धीरे बुझ गयी. इसी बीच हिरणी ने एक स्वस्थ शावक को जन्म दिया . 

ऐसा हमारी जिन्दगी मे भी होता है, जब हम चारो और से समस्याओं से घिर जाते है, नकारात्मक विचार हमारे दिमाग को जकड लेते है, कोई संभावना दिखाई नहीं देती , हमें कोई एक उपाय करना होता है.,
उस समय कुछ विचार बहुत ही नकारात्मक होते है, जो हमें चिंता ग्रस्त कर कुछ सोचने समझने लायक नहीं छोड़ते .
ऐसे मे हमें उस हिरणी से ये शिक्षा मिलती है की हमें अपनी प्राथमिकता की और देखना चाहिए, जिस प्रकार हिरणी ने सभी नकारात्मक परिस्तिथियाँ उत्पन्न होने पर भी अपनी प्राथमिकता "प्रसव "पर ध्यान केन्द्रित किया, जो उसकी पहली प्राथमिकता थी.
बाकी तो मौत या जिन्दगी कुछ भी उसके हाथ मे था ही नहीं, और उसकी कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया उसकी और गर्भस्थ बच्चे की जान ले सकती थी
उसी प्रकार हमें भी अपनी प्राथमिकता की और ही ध्यान देना चाहिए .
हम अपने आप से सवाल करें,
हमारा उद्देश्य क्या है, हमारा फोकस क्या है ?,
हमारा विश्वास, हमारी आशा कहाँ है,
ऐसे ही मझधार मे फंसने पर हमें अपने इश्वर को याद करना चाहिए ,
उस पर विश्वास करना चाहिए जो की हमारे ह्रदय मे ही बसा हुआ है .
जो हमारा सच्चा रखवाला और साथी है 

Friday, March 18, 2022

लघु-कथा : संगिनी

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कहानी के कुछ अंश :

स्नेहा ने आज सफ़ेद-गुलाबी रंग का वही सूट पहना हुआ था जो कुछ साल पहले रोहन ने ही उसे जन्मदिन पर गिफ्ट किया था l सूट अभी भी इतना नया लग रहा था मानों कल ही खरीदा हो, इतने सालों से सहज कर जो रखा था l"

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रोहन कुछ दिनों से भगवान को लगातार कोस रहा था कि वो उसकी मदद क्यों नहीं करते l पर आज उसे प्रकृति का नियम समझ आ रहा था, उसे गीता का सार भी आज इतने सालों बाद समझ आ रहा था कि-
‘भगवान आपको मौके देगा, मार्गदर्शन और संशाधन भी उपलब्ध करवा देगा पर युद्ध अंततः आपको ही करना होगा
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Tuesday, March 15, 2022

“इतिहास तब तक रुचिकर लगता है जब तक वह दृढ़तापूर्वक सत्य रहता हैं।”

भूतकाल में हुई घटनाओं के आंकलन से ही हम अपने वर्तमान की नीतियों का निर्माण करते हैं, जिससे एक स्थिर और बेहतर भविष्य का निर्माण संभव होता है ।
लेकिन दुर्भाग्यवश, प्राचीन से लेकर आधुनिक भारत के इतिहास की कितनी ही अनकही गाथाएं लोगों तक कभी पहुंची ही नहीं ।
#The_kashmir_files ऐसी ही एक घटना को लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास है ।
ऐसा नहीं है कि कश्मीर के जिस सत्य को हम जानते हैं वह भी पूर्णतः असत्य है, बल्कि वह अधूरा सत्य है ।
यह अधूरा सत्य अभी से नहीं, अपितु वर्षों से हम सभी को परोसा जा रहा है, और जो इतिहास हमें 2,3 लाइन में समेट कर पढ़ाया गया है, वह उससे कहीं अधिक विस्तृत और विकराल है ।
विश्व की सबसे उत्तम शासन व्यवस्था, सर्वप्रथम लोकतंत्र की संकल्पना, विजयनगर साम्राज्य जैसे दक्षिण भारत के इतिहास को मध्यकालीन भारतीय इतिहास में बहुत अल्प स्थान प्राप्त हुआ है, वहीं दिल्ली सल्तनत, मुगल साम्राज्य के इतिहास से आधे भारतीय इतिहास को भर दिया गया ।
आपको शायद याद होगा ब्रिटिश काल में भारतीय पुनर्जागरण के आरंभ का एक सबसे महत्वपूर्ण कारण यह भी था, कि जिस इतिहास को हम हजार साल में लगभग भूल चुके थे, 20वीं सदी में ब्रिटिश लोगों के खोजी प्रवत्ति और भारतीय महापुरषों की तत्परता के कारण वह इतिहास एक बार फिर से जन-जन तक पहुंच गया । जिससे उनमें एक गर्व की जो क्रांति संचारित हुई फिर वो 1947 में जा कर ही रुकी ।
परंतु आजादी के बाद भी वास्तविक इतिहास केवल उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों तक ही सीमित रहा गया ।
सामान्य जनमानस फिर उस इतिहास से अनभिज्ञ रह गया ।
जो इतिहास को भली भांति समझते हैं उनका ये नैतिक दायित्व है कि जनमानस तक सही इतिहास को पहुंचाने का प्रयास करें ।







Wednesday, December 1, 2021

समाज की संवेदनशीलता

 भोपाल में 5 सदस्यों के एक पूरे परिवार ने आत्महत्या कर ली । पहले जो बात सामने आयी उसके अनुसार कर्ज न चुका पाने के कारण उस परिवार ने यह कदम उठाया, परंतु बाद की जांच के बाद यह पता लगा कि उस परिवार के पास उस कर्ज के मुकाबले 5 गुना से अधिक अचल संपत्ति थी ।

तो फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया, जांच में पता लगा की कर्जदारों ने रोज-रोज उनके घर आकर उस परिवार का इतना अधिक अपमान किया कि उस परिवार को फिर इस अपमान के साथ इस समाज में अपना शेष जीवन व्यतीत करना उचित नहीं लगा ।

पुलिस ने अपनी कार्यवाही की और इन कर्ज देने वालों को गिरफ़्तार कर लिया ।

पर मेरा प्रश्न यहां यह है कि क्या वास्तव में उस परिवार की मौत के जिम्मेदार केवल वही कर्जदार थे ??? नहीं !

उनकी मौत के जिम्मेदार उनके पडोस और मौहल्ले वाले भी थे, जिन्होंने एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि रोज-रोज कोई क्यों उस परिवार का अपमान पूरे मोहल्ले के सामने कर के जा रहा है।

वो सभी सगे-संबंधी, दोस्त, रिश्तेदार भी इस मौत के लिए जिम्मेदार हैं जो इस मामले को सुलझाने में उस परिवार की मदद कर सकते थे ।

वो मदद भी सिर्फ साथ खड़े रहने की थी, क्योंकि पैसा चुकाने में वो परिवार स्वयं सक्षम था ।

पता नहीं हमने ये कैसे समाज का निर्माण कर लिया है । सोशल मीडिया पर Good-Morning मैसेज के साथ ही बड़ी-बड़ी ज्ञान की बातों से दिन को शुरू करने के बावजूद भी हम सभी के अंदर इतनी असंवेदनशीलता कहां से आ गई ।

हमारे घर के सामने वाले घर में कोई आत्महत्या कर लेता है और हम यह सोच लेते हैं कि उस घटना का हमसे कोई संबंध नहीं है ।

संबंध है, अगर आपने एक बार अपना ज्ञान सोशल मीडिया पर शेयर करने के साथ-साथ उस व्यक्ति के साथ भी शेयर कर लिया होता तो शायद वो भी आज जीवित होता ।

हिंदू-मुस्लिम मुद्दे पर किसी पोस्ट के  Comment box खोलता खून अगर उन गुंडों पर भी ज़ाहिर हो जाता तो शायद वो परिवार आज जीवित होता ।

😕😞

Sunday, June 20, 2021

The Ultimate Aim Of Life

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