आत्मा अमर है। उसका न जन्म होता है और न मृत्यु। शरीर नष्ट होता है, पर आत्मा शाश्वत रहती है। जब आत्मा पूर्ण रूप से शुद्ध होकर शरीर का त्याग करती है, तब वह परमात्मा में लीन होकर उनसे एकाकार हो जाती है। वही अवस्था मोक्ष कहलाती है।
परंतु जब आत्मा अपने साथ शुभ या अशुभ कर्मों के
संस्कार लेकर शरीर का त्याग करती है, तब वह सूक्ष्म शरीर धारण कर लेती
है। यही सूक्ष्म शरीर उसे पुनः किसी न किसी योनि अथवा लोक में ले जाता है। वहाँ
आत्मा को अपने ही कर्मों के अनुसार सुख और दुःख का अनुभव करना पड़ता है। इस प्रकार
कर्म ही जन्म-मरण के बंधन का मूल कारण बनते हैं।
इसलिए मनुष्य जीवन का परम उद्देश्य यह होना चाहिए
कि वह अपने पूर्व कर्मों के फलों को धैर्यपूर्वक स्वीकार करे और अपने वर्तमान
कर्मों को निष्काम भाव से संपन्न करे। मनुष्य को चाहिए कि वह हर कर्म को केवल
कर्तव्य समझकर करे, न कि फल की लालसा से।
वास्तव में हमारे कर्म ही हमारे सूक्ष्म शरीर का
निर्माण करते हैं। जब कर्म फल की इच्छा से किए जाते हैं, तब वे सूक्ष्म शरीर में संस्कार
बनकर संचित होते जाते हैं और आत्मा को बंधन में डालते हैं। परंतु जब वही कर्म
कर्तव्य-बोध, सेवा-भाव और समर्पण के साथ किए जाते हैं,
तब वे आत्मा को बंधन में नहीं डालते, बल्कि
उसे शुद्ध करते हैं।
अतः साधक के लिए आवश्यक है कि वह बुरे कर्मों का
पूर्ण त्याग करे और अच्छे कर्मों को भी इस भावना से करे कि — “मैं कर्ता नहीं हूँ, यह कार्य मुझसे परमात्मा द्वारा
कराया जा रहा है।” यही निष्काम कर्म योग का सार है।
इसी महान सत्य को श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान
श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में कहा है —
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। फल को परमात्मा
पर छोड़ देना ही वास्तविक मुक्ति का मार्ग है।
-Life With Rahul
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