प्रकृति का नियम ही है कि सब कुछ एक वृत्त, एक चक्र की तरह घूमता रहता है।
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, ग्रह अपनी कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं।
दिन के बाद रात, रात के बाद फिर दिन;
एक ऋतु के बाद दूसरी ऋतु और फिर वही ऋतु लौटकर आती है।
प्रकृति निरंतर घूमती रहती है,
वही क्रम, फिर वही क्रम।
मनुष्य भी इसी नियम का हिस्सा है।
वह जन्म लेता है, मृत्यु तक पहुँचता है और फिर जन्म लेकर उसी यात्रा को दोहराता है।
जन्म और मृत्यु के बीच की यात्रा में भी वह एक चक्र में ही बँधा रहता है,
कुछ पाने की इच्छा, इच्छा पूरी होने के बाद फिर एक नई इच्छा;
दुःख से बचने की इच्छा, सुख को बनाए रखने की इच्छा;
जो गलत है उसे ठीक करने की इच्छा और जो ठीक है उसे और बेहतर करने की इच्छा।
वह इन्हीं इच्छाओं और मानसिक द्वंद्वों के वृत्त में घूमता रहता है,
पाता है, खोता है, चाहता है, छोड़ता है और फिर चाहता है।
लेकिन यदि किसी मनुष्य को एक दिन इस चक्र का भान हो जाए,
तो धीरे-धीरे उसके भीतर यह वृत्त टूटने लगता है।
फिर कोई नई इच्छा जन्म नहीं लेती।
वह दुःख से भागने का प्रयास नहीं करता,
सुख को पकड़कर रखने का प्रयास नहीं करता।
जो है, उसे बदलने की उतनी बेचैनी नहीं रहती,
और जो नहीं है, उसे पाने की उतनी आकांक्षा भी नहीं रहती।
यहीं से मनुष्य वृत्त से निकलकर एक सीधी रेखा पर आ जाता है।
अब वह घूमता नहीं,
बस आगे बढ़ता है।
क्योंकि उसे ज्ञात हो जाता है कि इस सीधी रेखा पर चलते हुए
एक दिन इस यात्रा की भी परिणति होगी,
और उस परिणति के साथ
बार-बार लौटने वाला यह चक्र समाप्त हो जाएगा।
इसलिए बिना किसी प्रतिरोध के वह एक शांत गति और स्वीकारोक्ति के साथ एक सीधी रेखा पर आगे बढ़ता रहता है ।