ईश्वर का दिखाई न देना, हमारी सीमित इंद्रियों का प्रमाण है !
कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति जन्म से दृष्टिहीन है। आप उसे रंगों के बारे में कितना भी समझाने का प्रयास करें, वह कभी यह कल्पना नहीं कर सकता कि लाल, नीला या हरा वास्तव में कैसा होता है।
आप उससे कह सकते हैं कि हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियाँ हमें बाहरी संसार का ज्ञान कराती हैं।
कान से हम ध्वनि सुनकर ज्ञान प्राप्त करते हैं।
नाक से गंध सूँघकर ज्ञान प्राप्त करते हैं।
जीभ से स्वाद लेकर ज्ञान प्राप्त करते हैं।
त्वचा से स्पर्श करके ज्ञान प्राप्त करते हैं।
लेकिन जब आप उसे आँखों के बारे में समझाने की कोशिश करेंगे, तो एक मूलभूत समस्या सामने आएगी—आप उसे यह नहीं समझा पाएँगे कि देखना वास्तव में क्या होता है।
आप कह सकते हैं कि आँखें भी एक ज्ञानेंद्रिय हैं और इनके माध्यम से हमें प्रकाश, आकार, दूरी और रंग का ज्ञान होता है। लेकिन वह व्यक्ति "देखने" के उस अनुभव को समझ ही नहीं सकता, क्योंकि उसके पास देखने का प्रत्यक्ष अनुभव कभी रहा ही नहीं।
अब इसी विचार को थोड़ा आगे ले जाइए।
यदि कोई व्यक्ति आपसे कहे कि ईश्वर का अनुभव किसी ऐसी इंद्रिय या चेतना के माध्यम से किया जाता है, जिसे आपने कभी अनुभव ही नहीं किया, तो संभव है कि आपको उसकी बात पर विश्वास न हो।
लेकिन क्या केवल इसलिए कि आपने उस अनुभव को स्वयं नहीं किया, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह अनुभव अस्तित्व में ही नहीं है?
यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कोई जन्म से दृष्टिहीन व्यक्ति यह कहे—
«"मैंने कभी रंग नहीं देखा, इसलिए रंग नाम की कोई चीज़ अस्तित्व में नहीं है।"»
उसका निष्कर्ष उसके अनुभव की सीमा से पैदा हुआ है, वास्तविकता की सीमा से नहीं।
इसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति ने किसी विशेष आध्यात्मिक अनुभव के माध्यम से ईश्वर या किसी उच्चतर चेतना का अनुभव किया है, तो संभव है कि वह अनुभव उसके लिए उतना ही प्रत्यक्ष हो जितना हमारे लिए रंग या प्रकाश का अनुभव। लेकिन वह व्यक्ति भी शायद हमें उस अनुभव की वास्तविक प्रकृति पूरी तरह समझा न पाए—क्योंकि हमारे पास उसे ग्रहण करने की वही क्षमता या "इंद्रिय" नहीं है।
अब इसे आयामों के संदर्भ में समझिए
मनुष्य जिस भौतिक संसार को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करता है, वह मुख्यतः तीन स्थानिक आयामों (3D) में सीमित है।
गणित और दर्शन में प्रसिद्ध Flatland की कल्पना इसी विचार को समझाने के लिए की जाती है।
कल्पना कीजिए कि किसी कागज़ की सतह पर केवल दो आयामों में रहने वाले जीव हों। उनके लिए केवल लंबाई और चौड़ाई का अस्तित्व होगा। वे "ऊपर" और "नीचे" जैसी तीसरी दिशा को प्रत्यक्ष रूप से देख या अनुभव नहीं कर पाएँगे।
लेकिन हम, जो तीन आयामों में रहते हैं, उस पूरे कागज़ को उसके ऊपर से देख सकते हैं।
हम उस 2D संसार के किसी भी बिंदु को एक साथ देख सकते हैं, जबकि उस संसार में रहने वाला जीव केवल अपने सीमित दृष्टिकोण से ही उसे समझ सकता है।
अब यही कल्पना एक उच्चतर आयाम के संदर्भ में कीजिए।
यदि कोई चेतना हमारे अनुभव से परे किसी उच्चतर आयाम में अस्तित्व रखती हो ।
मान लीजिए पाँचवें आयाम में तो संभव है कि उसके लिए हमारी वास्तविकता उसी प्रकार दिखाई देती हो, जैसे हमारे लिए कागज़ पर बना द्वि-आयामी चित्र।
वह हमारी दुनिया के उन पहलुओं को देख या समझ सकती हो जिन्हें हम अपनी सीमित इंद्रियों और तीन-आयामी अनुभव के कारण प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते।
इस दृष्टिकोण से ईश्वर का दिखाई न देना आवश्यक रूप से ईश्वर के अभाव का प्रमाण नहीं है। यह हमारी अनुभूति की सीमा भी हो सकती है।
जिस प्रकार जन्म से दृष्टिहीन व्यक्ति के लिए रंग का अनुभव असंभव है, उसी प्रकार हमारे लिए किसी उच्चतर वास्तविकता या चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव हमारी वर्तमान इंद्रिय-व्यवस्था की सीमा से बाहर हो सकता है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि—
"ईश्वर दिखाई क्यों नहीं देता?"
बल्कि एक अधिक मूलभूत प्रश्न यह भी हो सकता है—
"क्या हमारी इंद्रियाँ वास्तविकता को पूरी तरह जानने में सक्षम हैं?"
शायद विज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि हमारी इंद्रियाँ और मस्तिष्क वास्तविकता का केवल एक सीमित हिस्सा ही अनुभव करते हैं, जबकि दर्शन हमें यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है कि उस सीमा के पार क्या हो सकता है।
इस अर्थ में विज्ञान और दर्शन एक ही निष्कर्ष नहीं देते, लेकिन वे हमें एक समान संभावना पर विचार करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं—
जो हमारी इंद्रियों को दिखाई नहीं देता, उसका अस्तित्व केवल इसलिए असंभव नहीं हो जाता।
और शायद ईश्वर का प्रश्न भी इसी सीमा पर खड़ा है -
अस्तित्व और हमारी अनुभूति के बीच की सीमा पर।
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